राजा साहब की $िफल्मी •िांदगी से संबंधित कई मार्मिक घटनाएं मन की भावनाओं को आज भी प्रभावित करती हैं। $िफल्म 'वह कौन थीÓ की शूटिंग चल रही थी। इसकी हीरोइन साधना पर राजा साहब का लिखा हुआ गीत 'लग जा गले से कि फिर यह मुला$कात हो न होÓ $िफल्माया जा रहा था कि साधना अनायास फूट-फूट कर रोने लगी और $िफल्म की शूटिंग रोक दी गई। कुछ देर बाद पता चला कि साधना पर इस गीत का इतना गहरा असर हुआ कि वह अपने आंसू नहीं रोक सकीं।
$िफल्म 'मेरा सायाÓ बन रही थी। प्रोड्यूसर प्रेमजी, गायिका लता मंगेशकर और संगीतकार मदन मोहन $िफल्म के टाइटल सॉन्ग के लिए गीतकार राजा मेहदी अली खां का बेचैनी से इंत•ाार कर रहे थे। वह लेट आए। गीत भी तैयार नहीं था। सभी निराश और बेचैन हो गए। राजा साहब बैठ गए। का$ग•ा का एक टुकड़ा उठाया और कुछ ही मिनटों में गीत लिखकर मदन मोहन की ओर बढ़ा दिया। यह गीत उन्हें इतना भाया कि राग अनंदी में उसी समय धुन तैयार हो गई। अगले दिन लता जी ने अपनी आवा•ा में इसे रिकार्ड करा दिया। यह गीत था- 'तू जहां जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगाÓ- जो इतना लोकप्रिय हुआ कि अपने आप में मिसाल बन गया। राज खोसला की $िफल्म के लिए 'झुमका गिरा रे बरेली के बा•ाार मेंÓ भी इसी प्रकार लिखा गया था।
इसी प्रकार की एक घटना $िफल्म डायरैक्टर मोहन कुमार के साथ घटी। उन्होंने आपनी $िफल्म 'अनपढ़Ó के लिए राजा साहब से गीत लिखने की $फरमायश की। राजा साहब ने वादा भी कर लिया, लेकिन भूल गए। कुछ दिनों बाद अचानक उनकी मुला$कात राजा साहब से मदन मोहन के घर हो गई। मोहन कुमार ने स$ख्त गिला किया, तो राजा साहब ने वहीं बैठे एक गीत के बोल लिख दिए। गीत था- 'आपकी न•ारों ने समझा प्यार के $काबिल मुझे!Ó यह गीत बाद में बहुत लोकप्रिय हुआ तथा आज भी इसका शुमार बीते समय के उन बेहतरीन गीतों में होता है, जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता।
बतौर गीतकार राजा साहब को दुनिया जानती है। वह अत्यंत लोकप्रिय शायर एवं व्यंग्यकार भी थे। बड़े शायरों की ग•ालों की पैरोडी लिख कर उन्होंने बेहतरीन $फन का मु•ााहिरा किया है। ज$फर की मशहूर ग•ाल लगता नहीं है, जी मेरा उजड़े दयार में की पैरोड़ी देखें—
बिकता नहीं है घी मेरा उजड़े दयार में
भूखा मरूंगा आलमे नापायदार में
$िफल्मी शायरी का बादशाह, अपने समय का हास्य-व्यंग्य का सबसे बड़ा शायर राजा मेहदी अली $खां जब इस दुनिया को अलविदा कह कर गए, तो उसके तकिए के नीचे साठ रुपए व बैंक की पासबुक में सि$र्फ तीन सौ चालिस रुपए का बैंक बैलेंस था। यह था राजा की बीस वर्षीय $िफल्मी •िांदगी का लेखा-जोखा।
डॉ। केवल धीर
(दैनिक भास्कर के रसरंग से )